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Vermiculture Taknik Evam Upyogita (Hindi)

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Vermiculture Taknik Evam Upyogita (Hindi)

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इस पुस्तक को सात शीर्षकों एवं 29 अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में केंचुए का सामान्य परिचय, आवास-व्यवहार, जैविक विविधता, वर्गीकी, मृदा पोषकता में योगदान, मृदा सूक्ष्म तंत्र के साथ सम्बन्ध, वर्मीकल्चर, वर्मीकम्पोस्टिंग, वर्मीकम्पोस्ट का जैव रासायनिक संगठन, वर्मीकम्पोस्ट का पादप उत्पादन में प्रयोग, वर्मीवाश : निर्माण एवं उपयोग तथा वर्मीकल्चर के अन्य महत्त्व पर सविस्तार सामग्री प्रस्तुत की गई है।  
केंचुए की जैविक विविधता एवं भारत वर्ष में इनके वितरण पर सामग्री प्रस्तुत है। मृदा के कार्बन, नत्रजन व अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों के चक्रीकरण में केंचुए की भूमिका पर 3 अध्याय लिखे गए हैं। सूक्ष्मजीवों एवं अन्य मृदा जीवों के साथ केंचुए के अन्तर्सम्बन्ध पर भी रोचक जानकारी प्रस्तुत की गई है।  
वर्मीकल्चर का वैज्ञानिक आधार एवं इसका पर्यावरण जैव तकनीकी उपयोग, वर्मीकम्पोस्टिंग का इतिहास, वर्मीकम्पोस्टिंग प्रजातियां, वर्मीकम्पोस्टिंग की प्रचलित विधियां, वर्मीकम्पोस्ट का जैव रासायनिक संगठन, वर्मीकम्पोस्टः गुणवत्ता प्रबन्धन तथा अन्य सम्बन्धित पहलुओं पर भी सचित्र जानकारी प्रस्तुत की गई है।  लेखक ने अपने विगत कई वर्षों के शोध अनुभव को भी पुस्तक में सहजता से उतारा है।  
पुस्तक में एक रोचक तथा नवीन अध्याय ‘वर्मीवाश’ एवं इसकी निर्माध विधि पर सचित्र जानकारी प्रस्तुत की गई है। आधुनिक प्रयोगों में वर्मीवाश एक उत्तम पादप वृद्धिकारक, कीटनाशी तथा पादप वृद्धि उद्दीपक के रूप में सामने आया है। वर्मीकल्चर के अन्य उपयोग जैसे कि कुक्कुट पालन, मछली पालन, झींगा पालन इत्यादि में भोजन के स्रोत के रूप में चर्चा की गई है तथा केंचुए से खाद्य पदार्थ ‘वर्ममील’ बनाने की विधि का भी विवरण दिया गया है। केंचुए के मास से प्राप्त प्रोटीन एवं विटामिन्स की मात्रा तथा केंचुए के औषधिक महत्त्व पर रोचक जानकारी पुस्तक में दी गई है। 

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